दावे के उलट आखिर क्यों गंदगी के आगोश में है देश की राजधानी दिल्ली

स्वच्छ भारत मिशन को लागू हुए चार साल बीत चुके हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्वच्छता की तस्वीर अभी तक मैली ही नजर आ रही

है। दिल्ली के वीआइपी क्षेत्रों को अगर छोड़ दिया जाए तो शेष दिल्ली में ज्यादातर जगहों पर कूड़ों के ढेर के साथ ही गंदे पड़े शौचालय स्वच्छता मिशन का मुंह चिढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि स्वच्छता रैंकिंग में दिल्ली का प्रदर्शन सुधर नहीं रहा है। यह तस्वीर तब है जबकि दिल्ली में हर साल करोड़ों रुपये सफाई के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं। आए दिन दिल्ली की अदालतें गंदगी को लेकर निगमों को फटकार लगाती रहती हैं, इसके बावजूद अभी तक सफाई के नाम पर निगमों की सिर्फ फाइलें ही भरी जा रही हैं।

खुले में शौच से मुक्त नहीं हो सके निगम

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् (NDMC) और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम को खुले में शौच मुक्त होने का प्रमाण पत्र मिल चुका है। वहीं राजधानी दिल्ली के दो बड़े निगम पूर्वी और उत्तरी निगम अभी तक यह प्रमाण पत्र नहीं पा सके हैं। यहां बता दें कि वर्ष 2017 में निगमों ने अपने आप को खुले में शौच मुक्त घोषित किया था। लेकिन केंद्रीय टीम के मानकों के मुताबिक अभी तक यह खुद को साबित नहीं कर सके हैं।

बढ़ते जा रहे हैं कूड़े के पहाड़

राजधानी में भलस्वा, गाजीपुर ओखला में कूड़े के पहाड़ बढ़ते ही जा रहे है। इन्हें बंद करने की समय सीमा कई वर्ष पहले खत्म हो चुकी है। इसके बावजूद आज भी इन साइटों पर निगम कूड़ा फेंक रहे हैं। कचरे का सौ फीसद निस्तारण नहीं होने की वजह से इनकी ऊंचाई 65-70 मीटर तक पहुंच चुकी है। गाजीपुर लैंडफिल साइट की बात करें तो निगम यहां प्रतिदिन 2600 मीट्रिक टन कूड़ा डालता है, लेकिन इसमें 1200 मीट्रिक टन कूड़े का उपयोग ही बिजली बनाने के लिए हो पाता है। ओखला में 3500 मीट्रिक टन कूड़ा गिरता है, जिसमें 2200 टन कूड़े का निस्तारण हो पाता है। ऐसी ही स्थित भलस्वा लैंडफिल की भी है।

टूटे पड़े नल, बिजली -पानी की भी समस्या

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् और दक्षिणी निगम के कुछ शौचालयों को छोड़ दिया जाए तो दिल्ली में नगर निगमों के सार्वजनिक शौचालय की स्थित दयनीय है। इनमें जगह-जगह गंदगी के साथ ही बिजली और पानी की भी समस्या बनी रहती है। यही नहीं नल चोरी होना और यूरिनल टूटे पड़े होने की वजह से कोई इनमें कदम भी रखना नहीं चाहता है। यही नहीं निगम के जो सार्वजनिक शौचालय चल भी रहे हैं। उनमें सूरज ढलते ही ताला लग जाता है। हालांकि उत्तरी निगम ने हाल ही में यूरिनल की देखरेख करने वाली निजी संस्थाओं से भी अनुबंध रद किया है। उत्तरी निगम में करीब 300 मूत्रलयों का संचालन होता है ।

आदेश गुप्ता (महापौर, उत्तरी दिल्ली नगर निगम) के मुताबिक, स्वच्छता रैकिंग जारी होने के बाद हमने अपने कार्यो की समीक्षा की है। सार्वजनिक शौचालयों से लेकर डलाव घरों और लैंडफिल साइट की ऊंचाई कम करने के लिए नई योजना बनाई है। आने वाले दो-तीन माह में सुधार दिखाई देगा।

मुकेश गोयल (नेता कांग्रेस दल, उत्तरी दिल्ली नगर निगम) का कहना है कि स्वच्छता रैकिंग से निगम के कार्य पता चल रहे हैं। स्वच्छता रैंकिंग कम होने की बजाय दोगुनी गति से गिर रही है। यह सीधे-सीधे भाजपा निगम नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

अनिल लाकड़ा (नेता प्रतिपक्ष, उत्तरी दिल्ली नगर निगम) की मानें तो  इनके पास सफाई के लिए छोटी या बड़ी गाड़ियां नहीं हैं। इनका ध्यान भ्रष्टाचार के ऊपर है, सफाई पर नहीं है। नीति और नीयत ठीक नहीं होने की वजह से निगम की स्वच्छता रैकिंग गिरी है।

इन सार्वजनिक स्थलों पर भी शौचालयों की स्थिति खराब

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के नजदीक नम्मा शौचालय, लाल किला के सामने सड़क पर बना शौचालय, एसपी मुखर्जी मार्ग पर बना शौचालय, आसफ अली रोड का शौचालय, कमला मार्केट थाने के पासबना शौचालय, ईस्ट पटेल नगर बाजार का शौचालय, कश्मीरी गेट बस टर्मिनल के नजदीक शौचालय, हैमिल्टन रोड का शौचालय, गोखले रोड का शौचालय, मिंटो रोड का शौचालय, कश्मीरी गेट स्थित पंजा शरीफ इलाके का शौचालय। चावड़ी बाजार स्थित शौचालय, सदर बाजार का शौचालय, लोथियान चौक का शौचालय।

गीला-सूखा कूड़ा भी नहीं होता है अलग

स्वच्छता सर्वेक्षण में उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की स्वच्छता रैकिंग में गिरावट आई है। निगम अधिकारियों की मानें तो गीला और सूखा कूड़ा अलग नहीं होना भी इसकी एक बड़ी वजह है। अगर लोग गीला व सूखा कूड़ा अलग-अलग रखेंगे तो उस कूड़े का निस्तारण आसानी से होगा। गीले कूड़े का उपयोग खाद और बिजली बनाने में, जबकि सूखे कूड़े को रिसाइकिल कर उपयोग किया जा सकता है

संसाधनों की भी है कमी

निगम के पास अनधिकृत कालोनियों में सफाई के लिए मशीने नही हैं। यही नहीं सफाई कर्मचारियों को भी न मॉस्क मिल पाते हैं और न ही वर्दी। यही नहीं संसाधनों की कमी और वेतन नहीं मिलने से अक्सर कर्मचारी हड़ताल व प्रदर्शन भी करते रहते हैं।

साभार दैनिक जागरण

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *